श्री गणेशाय नमः । ओम नमो भगवते वासुदेवाय ।
बद्रिकाश्रम निवासी प्रसिद्ध ऋषि श्री नारायण तथा श्री नर, अंतर्यामी नारायण स्वरूप भगवान श्री कृष्ण तथा उनके नित्य सखा नर स्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, उनकी लीला प्रकट करने वाली भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओं के वक्ता महर्षि वेदव्यास को नमस्कार कर, जय आसुरी संपत्तियों का नाश करके अंतःकरण पर दैवी संपत्तियों को विजय प्राप्त कराने वाले वाल्मीकि रामायण, महाभारत एवं अन्य सभी इतिहास-पुराणादि सद्ग्रंथों का पाठ करना चाहिए ।
पराशर के पुत्र तथा सत्यवती के हृदय को आनंदित करने वाले भगवान व्यास की जय हो, जिनके मुख कमल से निःसृत अमृतमयी वाणी का यह संपूर्ण विश्व पान करता है । वेदादि शास्त्रों के जानने वाले तथा अनेक विषयों के मर्मज्ञ विद्वान ब्राह्मण को स्वर्ण जटित सींगों वाली सैकड़ों गौओं को दान देने से जो पुण्य प्राप्त होता है, ठीक उतना ही पुण्य इस भविष्य महापुराण की उत्तम कथाओं के श्रवण करने से प्राप्त होता है ।
एक समय व्यास जी के शिष्य महर्षि सुमंतु तथा वशिष्ठ, पराशर, जैमिनी, याज्ञवल्क्य, गौतम, वैशंपायन, शौनक, अंगिरा और भरद्वाज महर्षिगण पांडव वंश में समुत्पन्न महाबलशाली राजा शतानीक की सभा में गए । राजा ने उन ऋषियों का अर्घ्यादि से विधिवत स्वागत सत्कार किया और उन्हें उत्तम आसनों पर बैठाया तथा भलीभांति उनका पूजन कर विनय पूर्वक इस प्रकार प्रार्थना की, "हे महात्माओं! आप लोगों के आगमन से मेरा जन्म सफल हो गया । आप लोगों के स्मरण मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है, फिर आप लोग मुझे दर्शन देने के लिए यहाँ पधारे हैं; अतः आज मैं धन्य हो गया । आप लोग कृपा करके मुझे उन पवित्र एवं पुण्यमयी धर्मशास्त्र की कथाओं को सुनाएं, जिनके सुनने से मुझे परम गति की प्राप्ति हो ।"
ऋषियों ने कहा, "हे राजन! इस विषय में आप हम सबके गुरु साक्षात नारायण स्वरूप भगवान वेदव्यास से निवेदन करें । वे कृपालु हैं, सभी प्रकार के शास्त्रों के और विद्याओं के ज्ञाता हैं । जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य सभी पातकों से मुक्त हो जाता है, उस महाभारत ग्रंथ के रचयिता भी यही हैं ।"
राजा शतानीक ने ऋषियों के कथानुसार, ऋषियों के कथनानुसार सभी शास्त्रों के जानने वाले भगवान वेदव्यास से प्रार्थना पूर्वक जिज्ञासा की, "प्रभो! मुझे आप धर्ममयी पुण्य कथाओं का श्रवण कराएं, जिससे मैं पवित्र हो जाऊँ और इस संसार सागर से मेरा उद्धार हो जाए ।"
व्यास जी ने कहा, "राजन! यह मेरा शिष्य सुमंतु महान तेजस्वी एवं समस्त शास्त्रों का ज्ञाता है । यह आपकी जिज्ञासा को पूर्ण करेगा ।" मुनियों ने भी इस बात का अनुमोदन किया, तदनंतर राजा शतानीक ने महामुनि सुमंतु से उपदेश करने के लिए प्रार्थना की, "हे द्विजश्रेष्ठ! आप कृपा कर उन पुण्यमयी कथाओं का वर्णन करें, जिनके सुनने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और शुभ फलों की प्राप्ति होती है ।"
महामुनि सुमंतु बोले, "राजन! धर्मशास्त्र सबको पवित्र करने वाले हैं । उनके सुनने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है । बताओ तुम्हारी क्या सुनने की इच्छा है?"
राजा शतानीक ने कहा, "ब्राह्मण देव! वे कौन से धर्मशास्त्र हैं, जिनके सुनने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है?"
सुमंतु मुनि बोले, "राजन! मनु, विष्णु, यम, अंगिरा, वशिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम, शंख, लिखित, हारीत तथा अत्रि आदि ऋषियों द्वारा रचित मन्वादि बहुत से धर्मशास्त्र हैं । इन धर्मशास्त्रों को सुनकर एवं उनके रहस्यों को भलीभांति हृदयमं- हृदयंगम कर मनुष्य देवलोक में जाकर परम आनंद को प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है ।"
शतानीक ने कहा, "प्रभो! जिन धर्मशास्त्रों को आपने कहा है, इन्हें मैंने सुना है; अथः इन्हें पुनः सुनने की इच्छा नहीं है । कृपा करके आप चारों वर्णों के कल्याण के लिए जो उपयुक्त धर्मशास्त्र हो, उसे मुझे बतलाएं ।"
सुमंतु मुनि बोले, "हे महाबाहो! संसार में निमग्न प्राणियों के उद्धार के लिए अठारह महापुराण, श्री राम कथा तथा महाभारत आदि सद्ग्रंथ नौकारूपी साधन हैं । अठारह महापुराणों तथा आठ प्रकार के व्याकरणों को भलीभांति समझकर सत्यवती के पुत्र वेदव्यास जी ने महाभारत संहिता की रचना की, जिसके सुनने से मनुष्य ब्रह्महत्या के पापों से मुक्त हो जाता है । इनमें आठ प्रकार के व्याकरण ये हैं— ब्राह्म, ऐन्द्र, याम्य, रौद्र, वायव्य, वारुण, सावित्र तथा वैष्णव । ब्राह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारदीय, मार्कंडेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ तथा ब्रह्मांड— ये अठारह महापुराण हैं । ये सभी चारों वर्णों के लिए उपकारक हैं, इनमें से आप क्या सुनना चाहते हैं?"
राजा शतानक जी ने कहा, "हे विप्र! मैंने महाभारत सुना है तथा श्री राम कथा भी सुनी है । अन्य पुराणों को भी सुना हूँ, किंतु भविष्य पुराण नहीं सुना है । अतः विप्रश्रेष्ठ! आप भविष्य पुराण को मुझे सुनाएं, इस विषय में मुझे महत् कौतूहल है ।"
सुमंतु मुनि बोले, "राजन! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है । मैं आपको भविष्य पुराण की कथा सुनाता हूँ, जिसके श्रवण करने से ब्रह्महत्या आदि बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं और अश्वमेधादि यज्ञों का पुण्य फल प्राप्त होता है तथा अंत में सूर्यलोक की प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं । यह उत्तम पुराण पहले ब्रह्मा जी द्वारा कहा गया है, विद्वान ब्राह्मण को इसका सम्यक अध्ययन कर अपने शिष्यों तथा चारों वर्णों के लिए उपदेश करना चाहिए । इस पुराण में श्रौत एवं स्मार्त सभी धर्मों का वर्णन हुआ है । यह पुराण परम मंगलप्रद, सद्बुद्धि को बढ़ाने वाला, यश एवं कीर्ति प्रदान करने वाला तथा परम पद मोक्ष प्राप्त कराने वाला है । इस भविष्य महापुराण में सभी धर्मों का सन्निवेश हुआ है तथा सभी कर्मों के गुणों और दोषों के फलों का निरूपण किया गया है । चारों वर्णों तथा आश्रमों के सदाचार का भी वर्णन किया गया है, क्योंकि सदाचार ही श्रेष्ठ धर्म है, ऐसा श्रुतियों ने कहा है; इसलिए ब्राह्मण को नित्य आचार का पालन करना चाहिए, क्योंकि सदाचार से विहीन ब्राह्मण किसी भी प्रकार वेद के फल को प्राप्त नहीं कर सकता । सदा आचार का पालन करने पर तो वह संपूर्ण फलों का अधिकारी हो जाता है, ऐसा कहा गया है । सदाचार को ही मुनियों ने धर्म तथा तपस्याओं का मूल आधार माना है । मनुष्य भी इसी का आश्रय लेकर धर्माचरण करते रहते हैं । इस प्रकार इस भविष्य महापुराण में आचार का वर्णन किया गया है । तीनों लोकों की उत्पत्ति, विवाहादि संस्कार विधि, स्त्री-पुरुषों के लक्षण, देव पूजा का विधान, राजाओं के धर्म एवं कर्तव्य का निर्णय, सूर्यनारायण, विष्णु, रुद्र, दुर्गा तथा सत्यनारायण का माहात्म्य एवं पूजा विधान, विविध तीर्थों का वर्णन, आपद्ध- आपद्ध- आपद्धर्म तथा प्रायश्चित विधि, संध्या विधि, स्नान, तर्पण, वैश्वदेव, भोजन विधि, जाति धर्म, कुल धर्म, वेद धर्म तथा यज्ञ मंडल में अनुष्ठित होने वाले विविध यज्ञों का वर्णन हुआ है । हे कुरुश्रेष्ठ शतानीक! इस महापुराण को ब्रह्मा जी ने शंकर को, शंकर ने विष्णु को, विष्णु ने नारद को, नारद ने इंद्र को, इंद्र ने पराशर को तथा पराशर ने व्यास को सुनाया और व्यास से मैंने प्राप्त किया । इस प्रकार परंपरा प्राप्त इस उत्तम भविष्य महापुराण को मैं आपसे कहता हूँ, इसे सुनें । इस भविष्य महापुराण की श्लोक संख्या पचास हजार है । इसे भक्तिपूर्वक सुनने वाला श्री, वृद्धि तथा संपूर्ण संपत्तियों को प्राप्त करता है । ब्रह्मा जी द्वारा प्रोक्त इस महापुराण में पांच पर्व कहे गए हैं— पहला ब्राह्म, दूसरा वैष्णव, तीसरा शैव, चौथा त्वाष्ट्र तथा पांचवा प्रतिसर्ग पर्व । पुराण के सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर तथा वंशानुचरित— ये पांच लक्षण बताए गए हैं तथा इनमें चौदह विद्याओं का भी वर्णन है । चौदह विद्याएं इस प्रकार हैं— चार वेद: ऋक्, यजु, साम, अथर्व; छह वेदांग: शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद, ज्योतिष; मीमांसा, न्याय, पुराण तथा धर्मशास्त्र । आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद तथा अर्थशास्त्र— इन चारों को मिलाने से अठारह विद्याएं होती हैं ।"
सुमंतु मुनि पुनः बोले, "हे राजन! अब मैं भूतसर्ग अर्थात समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन करता हूँ, जिसके सुनने से सभी पापों की निवृत्ति हो जाती है और मनुष्य परम शांति को प्राप्त करता है । हे तात! पूर्वकाल में यह सारा संस्कार- पूर्वकाल में यह सारा संसार अंधकार से व्याप्त था । कोई पदार्थ दृष्टिगत नहीं होता था, अविज्ञेय था, अतर्क्य था और प्रसुप्त सा था । उस समय सूक्ष्म, अतींद्रिय और सर्वभूत में उस परब्रह्म परमात्मा भगवान भास्कर ने अपने शरीर से नाना विध सृष्टि करने की इच्छा की और सर्वप्रथम परमात्मा ने जल को उत्पन्न किया तथा उसमें अपने वीर्य रूप शक्ति का आधान किया, इससे देवता, असुर, मनुष्य आदि संपूर्ण जगत उत्पन्न हुआ । वह वीर्य जल में गिरने से अत्यंत प्रकाशमान सुवर्ण का अंड हो गया । उस अंड के मध्य से सृष्टिकर्ता चतुर्मुख लोकपितामह ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए । नर (भगवान) से जल की उत्पत्ति हुई है, इसलिए जल को नार कहते हैं; वह नार जिसका पहले अयन (स्थान) हुआ, उसे नारायण कहते हैं । ये सदस्वरूप, अव्यक्त एवं नित्य कारण हैं, इनसे जिस पुरुष विशेष की सृष्टि हुई, वे लोक में ब्रह्मा के नाम से प्रसिद्ध हुए । ब्रह्मा जी ने दीर्घकाल तक तपस्या की और उस अंड के दो भाग कर दिए; एक भाग से भूमि और दूसरे से आकाश की रचना की । मध्य में स्वर्ग, आठों दिशाओं तथा वरुण का निवास स्थान अर्थात समुद्र बनाया । फिर महदादि तत्वों की तथा सभी प्राणियों की रचना की । परमात्मा ने सर्वप्रथम आकाश को उत्पन्न किया और फिर क्रमशः वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, इन तत्वों की रचना की । सृष्टि के आदि में ही ब्रह्मा जी ने उन सबके नाम और कर्म वेदों के निर्देशानुसार ही नियत कर उनकी अलग-अलग संस्थाएं बना दीं । देवताओं के तुषितादि गण, ज्योतिष्टोमादि सनातन यज्ञ, ग्रह, नक्षत्र, नदी, समुद्र, पर्वत, सम एवं विषम भूमि आदि उत्पन्न कर काल के विभागों: संवत्सर, दिन, मास आदि और ऋतुओं आदि की रचना की । काम, क्रोध आदि की रचना कर विविध कर्मों के सद-सद्विवेक के लिए धर्म और अधर्म की रचना की और नाना विध प्राणिजगत की सृष्टि कर उनको सुख-दुख, हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से संयुक्त किया । जो कर्म जिसने किया था, तदनुसार उनकी इंद्र, चंद्र, सूर्य आदि पदों पर नियुक्ति हुई । हिंसा, अहिंसा, मृदु, क्रूर, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य आदि जीवों का जैसा स्वभाव था, वह वैसे ही उनमें प्रविष्ट हुआ, जैसे विभिन्न ऋतुओं में वृक्षों में पुष्प, फल आदि उत्पन्न होते हैं । इस लोक की अभिवृद्धि के लिए ब्रह्मा जी ने अपने मुख से ब्राह्मण, बाहुओं से क्षत्रिय, ऊरु अर्थात जंघा से वैश्य और चरणों से शूद्रों को उत्पन्न किया । ब्रह्मा जी के चारों मुखों से चार वेद उत्पन्न हुए; पूर्व मुख से ऋग्वेद प्रकट हुआ, उसे वशिष्ठ मुनि ने ग्रहण किया; दक्षिण मुख से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ, उसे महर्षि याज्ञवल्क्य जी ने ग्रहण किया; पश्चिम मुख से सामवेद निःसृत हुआ, उसे गौतम ऋषि ने धारण किया और उत्तर मुख से अथर्ववेद प्रादुर्भू- प्रादुर्भूत हुआ, जिसे लोक पूजित महर्षि शौनक जी ने ग्रहण किया । ब्रह्मा जी के लोक प्रसिद्ध पंचम ऊर्ध्वमुख से अठारह पुराण, इतिहास और यमादि स्मृति शास्त्र उत्पन्न हुए । इसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने देह के दो भाग किए; दाहिने भाग को पुरुष तथा बाएं भाग को स्त्री बनाया और उसमें विराट पुरुष की सृष्टि की । उस विराट पुरुष ने नाना प्रकार की सृष्टि रचने की इच्छा से बहुत काल तक तपस्या की और सर्वप्रथम दस ऋषियों को उत्पन्न किया, जो प्रजापति कहलाए । उनके नाम इस प्रकार हैं— नारद, भृगु, वशिष्ठ, प्रचेता, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा और मरीचि । इस प्रकार अन्य महातेजस्वी ऋषि भी उत्पन्न हुए । अननंतर देवता, ऋषि, दैत्य और राक्षस, पिशाच, गंधर्व, अप्सरा, पितर, मनुष्य, नाग, सर्प आदि योनियों के अनेक गण उत्पन्न किए और उनके रहने के स्थानों को बनाया । विद्युत, मेघ, वज्र, इंद्रधनुष, धूमकेतु (पुच्छल तारे), उल्का, निर्घात (बादलों की गड़गड़ाहट) और छोटे-बड़े नक्षत्रों को उत्पन्न किया । मनुष्य, किन्नर, अनेक प्रकार के मत्स्य, वराह, पक्षी, हाथी, घोड़े, पशु, मृग, कूर्म, कीट, पतंग आदि छोटे-बड़े जीवों को उत्पन्न किया । इस प्रकार उन भास्कर देव ने त्रिलोकी की रचना की । हे राजन! इस सृष्टि की रचना कर सृष्टि में जिन-जिन जीवों का जो-जो कर्म और क्रम कहा गया है, उसका मैं वर्णन करता हूँ, आप सुनें । हाथी, व्याल, मृग और विविध पशु, पिशाच, मनुष्य तथा राक्षस आदि जरायुज (गर्भ से उत्पन्न होने वाले) प्राणी हैं । मत्स्य, कछुए, सर्प, मगर तथा अनेक प्रकार के पक्षी अंडज (अंडे से उत्पन्न होने वाले) हैं । मक्खी, मच्छर, जू, खटमल आदि सब स्वेदज हैं, अर्थात पसीने की ऊष्मा से उत्पन्न होते हैं । भूमि को उद्भेद कर उत्पन्न होने वाले वृक्ष, औषधियां आदि उद्भिज्ज सृष्टि हैं । जो फल के पकने तक रहें और पीछे सूख जाएं या नष्ट हो जाएं तथा बहुत फूल और फल वाले वृक्ष हैं, वे औषधि कहलाते हैं और जो पुष्प के आए बिना ही फलते हैं, वे वनस्पति तथा जो फूलते और फलते हैं, उन्हें वृक्ष कहते हैं । इसी प्रकार गुल्म, वल्ली, वितान आदि भी अनेक भेद होते हैं । ये सब बीज से अथवा कांड से, अर्थात वृक्ष की छोटी सी शाखा काटकर भूमि में गाड़ देने से उत्पन्न होते हैं । ये वृक्ष आदि भी चेतना शक्ति संपन्न हैं और इन्हें सुख-दुख का ज्ञान रहता है, परंतु पूर्व जन्म के कर्मों के कारण तमोगुण से आच्छन्न रहते हैं, इसी कारण मनुष्यों की भांति बातचीत आदि करने में समर्थ नहीं हो पाते । इस प्रकार यह अचिंत्य चराचर जगत भगवान भास्कर से उत्पन्न हुआ है । जब वह परमात्मा निद्रा का आश्रय ग्रहण कर शयन करता है, तब यह संसार उसमें लीन हो जाता है और जब निद्रा का त्याग करता है, अर्थात जागता है, तब सब सृष्टि उत्पन्न होती है और समस्त जीव पूर्व कर्मानुसार अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं । वह अव्यय परमात्मा संपूर्ण चराचर संसार को जाग्रत और शयन दोनों अवस्थाओं द्वारा बार-बार उत्पन्न और विनष्ट करता रहता है । परमेश्वर कल्प के प्रारंभ में सृष्टि और कल्प के अंत में प्रलय करते हैं । कल्प परमेश्वर का दिन है, इस कारण परमेश्वर के दिन में सृष्टि और रात्रि में प्रलय होता है । हे राजा शतानीक! अब आप काल गणना को सुनें । अठारह निमेष (पलक गिरने के समय को निमेष कहते हैं) की एक काष्ठा होती है, अर्थात जितने समय में अठारह बार पलकों का गिरना हो, उतने काल को काष्ठा कहते हैं । तीस काष्ठा की एक कला, तीस कला का एक क्षण, बारह क्षण का एक मुहूर्त, तीस मुहूर्त का एक दिन-रात, तीस दिन-रात का एक महीना, दो महीनों की एक ऋतु, तीन ऋतु का एक अयन तथा दो अयनों का एक वर्ष होता है । इस प्रकार सूर्य भगवान के द्वारा दिन-रात्रि का काल विभाग होता है । संपूर्ण जीव रात्रि को विश्राम करते हैं और दिन में अपने-अपने कर्म में प्रवृत्त होते हैं । पितरों का दिन-रात मनुष्यों के एक महीने के बराबर होता है, अर्थात शुक्ल पक्ष में पितरों की रात्रि और कृष्ण पक्ष में दिन होता है । देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है, अर्थात उत्तरायण दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है । हे राजन! अब आप ब्रह्मा जी के दिन-रात और एक-एक युग के प्रमाण को सुनें । सत्ययुग चार हजार वर्ष का है, उसके संध्यांश के चार सौ वर्ष तथा संध्या के चार सौ वर्ष मिलाकर इस प्रकार चार हजार आठ सौ दिव्य वर्षों का एक सत्ययुग होता है । इसी प्रकार त्रेतायुग तीन हजार वर्षों का है,
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