Item: भविष्य पुराण अध्याय 03

राजा सतानीक और सुमन्तु मुनि का संवाद

राजा सतानीक ने कहा:

हे मुनि! आपने मुझे जातकर्म आदि संस्कारों के विषय में बताया। अब आप इन संस्कारों के लक्षण तथा चारों वर्ण एवं आश्रम के धर्म बतलाने की कृपा करें।

सुमन्तु मुनि बोले:

हे राजन! गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारों के करने से द्विजातियों के बीज संबंधी तथा गर्भ संबंधी सभी दोष निवृत्त हो जाते हैं।

​वेद अध्ययन, व्रत, होम, नैवेद्य व्रत, त्रैविद्य व्रत, देवर्षि-पितृ तर्पण, पुत्रोत्पादन, पंचमहायज्ञ और ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों के द्वारा यह शरीर ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हो जाता है। अब इन संस्कारों की विधि को आप संक्षेप में सुनें।

​नामकरण एवं अन्य संस्कार विधि

  • जातकर्म संस्कार: पुरुष का जातकर्म संस्कार नालच्छेदन से पहले किया जाता है। इसमें वेद मंत्रों के उच्चारण पूर्वक बालक को सुवर्ण, मधु (शहद) और घृत (घी) का प्राशन कराया जाता है।
  • नामकरण संस्कार: दसवें दिन, बारहवें दिन, अठारहवें दिन अथवा एक मास पूरा होने पर शुभ तिथि, मुहूर्त और शुभ नक्षत्र में नामकरण संस्कार किया जाता है।
    • ब्राह्मण का नाम मंगलवाचक रखना चाहिए, जैसे— शिवशर्मा
    • क्षत्रिय का नाम बलवाचक होना चाहिए, जैसे— इन्द्रवर्मा
    • वैश्य का नाम धनयुक्त होना चाहिए, जैसे— धनवर्धन
    • शूद्र का भी यथाविधि नाम रखना चाहिए, जैसे— देवदास
  • स्त्रियों का नामकरण: स्त्रियों का नाम ऐसा रखना चाहिए जिसे बोलने में कष्ट न हो, क्रूर न हो, अर्थ स्पष्ट और अच्छा हो, जिसके सुनने से मन प्रसन्न हो तथा मंगलसूचक एवं आशीर्वादयुक्त हो। जिसके अंत में आकार, ईकार आदि दीर्घ स्वर हों, जैसे— यशोदा देवी
  • निष्क्रमण संस्कार: जन्म से बारहवें दिन अथवा चतुर्थ मास में बालक को घर से बाहर निकालना चाहिए, इसे निष्क्रमण कहते हैं।
  • अन्नप्राशन संस्कार: छठे मास में बालक का अन्नप्राशन संस्कार करना चाहिए।
  • मुंडन संस्कार: पहले या तीसरे वर्ष में मुंडन संस्कार करना चाहिए।

​यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार की आयु

​गर्भ से वर्ष की गणना के अनुसार:

  • ब्राह्मण: आठवें वर्ष में (ब्रह्मतेज की इच्छा रखने वाले का पाँचवें वर्ष में)।
  • क्षत्रिय: ग्यारहवें वर्ष में (बल की इच्छा रखने वाले का छठे वर्ष में)।
  • वैश्य: बारहवें वर्ष में (धन की कामना रखने वाले का आठवें वर्ष में) यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए।
    • ब्राह्मण: कृष्ण कस्तूरी मृगचर्म
    • क्षत्रिय: रुरु नामक मृग का चर्म
    • वैश्य: बकरे का चर्म
  • ब्राह्मण: सन (पटुआ)
  • क्षत्रिय: टाट/अलसी
  • वैश्य: भेड़ के ऊन का वस्त्र
  • ब्राह्मण: तीन लड़ी वाली सुंदर, चिकनी मूंज की।
  • क्षत्रिय: मूरवा (मुराके) की।
  • वैश्य: सन की मेखला।
  • नोट: मूंज आदि न मिलने पर क्रमशः कुशा, अश्मंतक और बलवज नामक तृण की मेखला को तीन लड़ी वाली करके, उसमें एक, तीन अथवा पाँच ग्रंथियां (गांठें) लगानी चाहिए।
  • ब्राह्मण: कपास के सूत का।
  • क्षत्रिय: सन के सूत का।
  • वैश्य: भेड़ के ऊन का यज्ञोपवीत धारण करे।
  • ब्राह्मण: बिल्व, प्लास (पलाश) या प्रक्ष का दंड, जो सिर तक ऊँचा हो।
  • क्षत्रिय: वड़, खदिर या बेंत के काष्ठ का दंड, जो मस्तक तक ऊँचा हो।
  • वैश्य: पैलभ, पोलू वृक्ष की लकड़ी, गूलर अथवा पीपल के काष्ठ का दंड, जो नासिका तक ऊँचा हो।
  • विशेष: ये दंड सीधे, छिद्ररहित और सुंदर होने चाहिए।
  • ब्राह्मण: "भवती भिक्षाम मे देही"
  • क्षत्रिय: "भिक्षाम भवती मे देही"
  • वैश्य: "भिक्षाम देही मे भवती"
  • पूर्व मुख: आयु की वृद्धि होती है।
  • दक्षिण मुख: यश की प्राप्ति होती है।
  • पश्चिम मुख: लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
  • उत्तर मुख: सत्य की अभिवृद्धि होती है।
  1. ब्राह्म तीर्थ: अंगूठे के मूल में स्थित। (आचमन इसी तीर्थ से करना चाहिए)।
  2. प्राजापत्य तीर्थ: कनिष्का (सबसे छोटी उंगली) के मूल में स्थित। (विवाह के समय लाजा-होमादि और सोमपान इससे करें)।
  3. देव तीर्थ: उंगलियों के अग्र भाग में स्थित। (देवाचा, दक्षिणा आदि कर्म इससे करें)।
  4. पितृ तीर्थ: तर्जनी और अंगूठे के बीच में स्थित। (तर्पण, पिंडदान आदि कर्म इससे करें)।
  5. सौम्य तीर्थ: हाथ के मध्य भाग में स्थित। (कमंडलु ग्रहण, दधि-प्राशनादि कर्म इससे करें)।
  • प्रथम आचमन: ऋग्वेद की तृप्ति होती है।
  • द्वितीय आचमन: यजुर्वेद की तृप्ति होती है।
  • तृतीय आचमन: सामवेद की तृप्ति होती है।
  • अंगूठे से मुख का स्पर्श: अथर्ववेद की तृप्ति होती है।
  • ओष्ठ के मार्जन से: इतिहास और पुराणों की तृप्ति होती है।
  • मस्तक पर अभिषेक से: भगवान रुद्र प्रसन्न होते हैं।
  • शिखा के स्पर्श से: ऋषिगण तृप्त होते हैं।
  • दोनों आँखों के स्पर्श से: सूर्य देव तृप्त होते हैं।
  • नासिका के स्पर्श से: वायु देव तृप्त होते हैं।
  • कानों के स्पर्श से: दिशाएं तृप्त होती हैं।
  • भुजा के स्पर्श से: यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा अग्निदेव तृप्त होते हैं।
  • नाभि और प्राणों की ग्रंथियों के स्पर्श से: सभी तृप्त हो जाते हैं।
  • पैर धोने से: विष्णु भगवान प्रसन्न होते हैं।
  • भूमि में जल छोड़ने से: वासुकी आदि नाग तृप्त होते हैं।
  • गिरने वाले जल बिंदुओं से: चार प्रकार के भूतग्राम की तृप्ति होती है।
  • अंगुष्ठ (अंगूठा): अग्नि रूप
  • तर्जनी: वायु रूप
  • मध्यमा: प्रजापति रूप
  • अनामिका: सूर्य रूप
  • कनिष्का: इन्द्र रूप
  • सव्य (उपवीती): दाहिने हाथ के नीचे और बाएं कंधे पर यज्ञोपवीत रहने से द्विज सव्य कहलाता है (देव कार्य के लिए)।
  • अपसव्य (प्राचीनावीती): यज्ञोपवीत के दाहिने कंधे से बाईं ओर रहने से अपसव्य कहलाता है (पितृ कार्य के लिए)।
  • निवीती: गले में माला की तरह यज्ञोपवीत रहने से निवीती कहा जाता है (ऋषि कार्य या सामान्य समय)।

विशेष: मेखला, मृगछाला, दंड, यज्ञोपवीत और कमंडलु— इनमें से कोई भी चीज भग्न (टूट) जाए, तो उसे जल में विसर्जित कर मंत्रोच्चारण पूर्वक दूसरा धारण करना चाहिए।

​कंठ तक जल जाने से क्षत्रिय की, हृदय तक जल जाने से ब्राह्मण की, वैश्य की जल के प्राशन से तथा शूद्र की जल के स्पर्श मात्र से शुद्धि हो जाती है। ब्राह्मण का दाहिना हाथ सर्वदेवमय है और इस विधि से आचमन करने वाला अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।

इस प्रकार भविष्य पुराण का अध्याय ३ समाप्त हुआ।

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